जीवन और मृत्यु का चक्र: एक अनंत यात्रा

पिता जा चुके थे। उस शाम की ठंडी हवा में एक सन्नाटा था, जैसे प्रकृति भी उनकी अनुपस्थिति को महसूस कर रही हो। हमारा घर, जो कभी उनके कदमों से गूंजती थी, अब खामोश है। उनके पुराने कुर्ते की महक अभी भी कोने में टंगे कपड़ों में बसी है, और उनकी कड़क आवाज़, जो कभी मुझे डाँटती थी, अब सिर्फ़ मन के किसी कोने में गूंजती है। पिता-पुत्र का रिश्ता सिर्फ़ खून का नहीं, आत्मा का बंधन होता है। यहाँ पिता वो वटवृक्ष है, जिसकी छाँव में बेटा बड़ा होता है—कभी उसकी सख्ती से डरता है, तो कभी उसके प्यार में डूब जाता है। एक समय बाप अपने बाप को उसकी गलतियों के लिए डांटता है; कुछ सालों के बाद समय का पहिया बदल जाता है। लेकिन जब वो वृक्ष गिर जाता है, छाँव के साथ-साथ वो आश्रय भी चला जाता है। मन में एक अजीब-सा चिंतन उमड़ता है—दुःख, शून्यता, और कहीं गहरे में गर्व भी। दुःख इस बात का कि अब उनकी गोद में सिर रखकर रो नहीं सकता, न कभी रो पाया। शून्यता इस बात की कि जो सवाल अधूरे रह गए, उनके जवाब अब कौन देगा? और गर्व इस बात का कि मैं उसी इंसान का बेटा हूँ, जिसने मुझे जीना सिखाया। कभी-कभी रात के सन्नाटे में उनकी बातें याद आती है। ...